Monday, January 23, 2017



About Films


Satya Prakash's POV





Antariksh is a student of music. He has done three years graduation in Indian music with a musical instrument Violin.However, he is mad at playing guitar, progressive metallica. He is good at composition.


The three musical orchestration, he has composed two years before, are themetically scintillating.                                                   






Themes are Time has left us behind, Caravan of Dreams & Turmoil of Thoughts.



Hey everyone, Just uploaded 3 of my Orchestral pieces on Youtube. Here are the links. Do subscribe.


https://youtu.be/M6prjPI4OII

https://youtu.be/SsfP9JmZk6w
https://youtu.be/xrxFZbG6d_I




Copy the link on youtube  and enjoy orchestral pieces of his musical composition. Three pieces will take your 6 -7 minutes all together.



Wednesday, January 18, 2017




About Films


Satya Prakash's POV


Intense intimate moment between Nobel laureate Rabindranath Tagore and Victoria Ocampo of Argentina at the time of departure from Argentina in 1923.This is the scene of our film " THINKING OF HIM".
Victor Bannerjee as Rabindranath Tagore
Eleonora Wexler as Victoria Ocampo
Co-productions:

Johnson-Suraj Films International, India
Cesar Films,Argentina


Tuesday, January 17, 2017







About Films

Satya Prakash's POV



बच्चे अग्रगामी होते हैं, रास्ता छोड़ दीजिये
(इक बेजोड़-हँसोड़ वाकया )

मुम्बई में हमने अपनी बिल्डिंग के सोसाइटी के कुछ कर्ता-धर्ता और फॅमिली से फिल्म "दंगल " के बारे में पूछा ! सबने उत्साहवर्धक उत्तर दिया , वाह ! क्या फिल्म है ! उसी लहज़े में, जैसे तबलावादक उस्ताद ज़ाकिर हुसेन साहेब चाय की चुस्की लेकर बोल उठते हैं , " वाह ! ताज़ !!!!!

लेकिन अपने पड़ोसी फिल्म वालों से उसी तरह का व्यवहार करते हैं जैसे कोई अछूत हो ! फिल्म "दंगल" , " सुलतान" ,"दबंग" आदि फिल्मों को देखेंगे ! पांच सौ , सात सौ करोड़ जाकर दे आते हैं लेकिन उनसे थोड़ा हटकर रहते हैं! दिलचस्प बात जो है कि ये लोग फ़िल्मी लोगों के गॉसिप बहुत पढ़ते हैं ! स्मार्ट-फ़ोन पर ग्लैमर पिक्स और विडियो ज़रूर देखते हैं लेकिन अपनी बिल्डिंग में रहते फ़िल्मी लड़की-लड़कियों से अपने बच्चों से दूरियां बनाकर रखते हैं ! !



मेरे यहाँ एक सिने-सेलिब्रिटी बिल्डिंग में आते हैं ! बच्चे तो बच्चे , बूढ़े , युवा -युवती सब उन्हें घेर लेते हैं और उनसे शेक-हैण्ड करते हैं और दे दना दन सेल्फी शुरू ! फिर इनका पाखण्ड तो उसे समय और बढ़ जाता है जब अपनी लड़की को हीरोइन बनाने की टिप्स मांगते हैं ! वे सेलिब्रिटी कलाकार का सेल फ़ोन भी लेते हैं और  अनुरोध करते हैं कि उनकी बेटी को फिल्मों में आने में मदद करें !

                                                                  
बच्चों का भविष्य और परिवार की प्रगति अग्रगामी होते हैं जो  परिवार की पुरातन सोच, पाखण्ड और लोगों के प्रति दुराग्रह को इक झटके में ख़त्म कर देते हैं !



   

Sunday, January 15, 2017



About Films


Satya Prakash's POV



गाँधीजी के अवदान विलक्षण हैं !

महात्मा गाँधी दुनियां के जनमानस का बौद्धिक हिस्सा के साथ भारत के स्वन्त्रता-आंदोलन के अग्रणी नेता और विचारक रहे ! ये एक ऐसा व्यक्तित्व है जो आज भी हत्या किये जाने के बाद ज़िंदा है ! हमारे रुपये से लेकर साहित्य , राजनीति , इतिहास ,नागरिक शास्त्र , कला और सिनेमा में महात्मा गाँधी हैं ! दुनिया के कई गुलाम देशों ने महात्मा गाँधी के सिद्धांत " सत्य और अहिंसा" से अपने को आज़ाद करवाया ! दक्षिण -अफ्रीका की प्रीटोरिया की नस्ल-भेदी सरकार के खिलाफ पहला कानूनी लड़ाई आरम्भ की ! 


१८९३ का वो काला दिन गाँधी के जीवन को महान बनाने वाला दिन साबित हुआ ! दक्षिण-अफ्रीका का डरबन शहर का वो छोटा सा स्टेशन  पिएटरमैरिट्ज़बर्ग पर चलती ट्रैन से बर्रिस्टर मोहनदास करमचंद गाँधी को गोरे अभिजात्य -यात्रियों ने फेंक दिया था सिर्फ इसीलिये कि गाँधी सांवले थे ! 


मोहनदास करमचंद गाँधी इंडियन डायस्पोरा के एक आदमी का केस लड़ने गए थे ! इंडियन डायस्पोरा के साथ-साथ ,वहां के काले रंग के नस्ल वाले मूल निवासियों के साथ भेद-भाव किया जाता था और उन्हें गुलामों की तरह इस्तेमाल किया जाता था ! गाँधी का महात्मा बनने की प्रक्रिया आरम्भ होती है , वो भारत नहीं लौटते हैं और वहां रहकर इन नस्लभेदी सरकार के खिलाफ अहिंसात्मक तरीके से आंदोलन करते हैं !


 प्रीटोरिया सरकार की पुलिस और फौज की बर्बर उपिस्थिति में प्रीटोरिया सरकार के सरकारी मसौदे को जलाते हैं और मार खाते हैं ! उन्हें गिरफ्तार किया जाता है !
१९१५ में गाँधी भारत आते हैं और सारे हिंदुस्तान को थर्ड क्लास के रेलवे कम्पार्टमेंट में बैठकर देश को जानते हैं !जैसे-जैसे देश के ह्रदय-स्थल की तरफ बढ़ते जाते हैं , उनके शरीर से पेंट-शर्त , कोर्ट , टाई सभी उतरते जाते हैं ! चम्पारण के किसान की गरीबी, मुफलिसी ने उन्हें यूँ प्रताड़ित किया कि कमर से नीचे ,घुटने के ऊपर तक उनकी धोती रह गयी थी !इस देश की गुलाम और गरीब जनता की तरह हो गए थे ! जनता की उम्मीद बनकर  भारतीय स्वाधीनता-आंदोलन के नेता बन गए थे ! गाँधी जहाँ जाते , लाखों की भीड़ उन्हें देखने के लिए नहीं आती थी बल्कि अपनी गरीबी,गुलामी से आज़ादी की गुहार करने जुटती थी!

 दक्षिण अफ्रीका के नस्ल भेद के विरूद्ध लड़ाई ने ही भारतीय समाज का सबसे बड़ा कलंक "जाति-व्यवस्था " के विरूद्ध भी लड़ाई छेड़ी जो सुधार-मूलक था ! शुद्र भी हरि के जन हैं और उन्हें "हरिजन" कहा  ! आदर्श और ह्रदय-परिवर्तन में उन्हें अगाध विश्वास था ! जाति का प्रचंड -विरोध  अपनी पत्नी बा से लड़ाई की वजह भी बना !

 गांधी महात्मा बन चुके थे ! विश्व कवि रबिन्द्रनाथ टैगोर ने मोहनदास करमचंद गांधी के संत की तरह जीवन को देख कर ही उन्हें "महात्मा" की महान उपाधि से गौरवान्वित किया था ! 

 आज उनकी शालीनता , उनके स्वदेशी चरखे को भले राजनीति के लिए हटाने की कोशिश कर ले , भले ही प्रधानमंत्री मोदी जी 1893 के " ट्रैन-यात्रा  के नस्ल-भेदी " एपिसोड को वहां जाकर जीवंत कर ट्रैन में बैठकर उसी स्टेशन पर उतरते और भाषण देते हैं ! मोदी जी ने महात्मा गाँधी और नेल्सन- मंडेला को विश्व के दो महान नेता ज़रूर बताते हैं  लेकिन खादी दिवस पर गाँधी के फोटो को हटाकर स्वयं को स्थापित कर, उस महान विभूति गाँधी के सम्मान को हल्का भी कर जाते हैं !



विश्व भर में  गाँधी की महिमा को मिटाना बहुत मुश्किल है ! इसीलिए, गाँधी के नाम से पूरी दुनियां में पुस्तक लिखी  जाती है , गाँधी - दर्शन पढ़ाया जाता है , गाँधी पर फ़िल्में बनती हैं , विदेशों में, प्रतिष्ठानों और  सडको के नाम उनके नाम पर रखा जाता है !   
महात्मा गाँधी अपनी आदर्शवादी सिद्धांत की विशालता में उतने ही महान हैं जितना कि शहीद- ऐ -आज़म भगत सिंह अपनी क्रांतिकारिता में ! 


दोनों के प्रति आलोचनात्मक दृष्टिकोण रखते हुए भी उन्हें सलाम तो कर ही सकते हैं !

Friday, January 13, 2017



About  films


Satya Prakash's POV

निंदक आत्महंता होते हैं !
मुम्बई वैसे भी तटीय शहर है , समंदर में इतना पानी है कि अच्छे -अच्छे तैराक भी हाफ-हाफ कर दम तोड़ देते हैं, इसीलिए दुःसाहस का आयोजन भी पूर्व-तैयारी के साथ करना चाहिए वरना समंदर का किनारा तो बहुत बेहतर है ! घुटने तक के पानी में जाकर डूबते सूरज को देख लो, लगता है आग का गोला भी समंदर के अंदर समां जाएगा लेकिन सूरज आत्महंता नहीं होता है ! वो आत्महत्या नहीं करना चाहता है और इसीलिए सूरज दुनिया को प्रदीप्त करने के लिए खुद आग के गोले की तरह जलता रहता है ! जलन और प्रदीप्त होना उसके जीवन का कर्तव्य है !समंदर के गहरे पानी में जाएगा तो मौत तय है !



समंदर बहता रहता है , तट से टकराता और अपने जलीय परिवेश के ह्रदय -तल में लौट जाता है ! समंदर अपने तट से बाहर निकलता है तो समंदर मनुष्य-सभ्यता को ख़त्म कर देता है ! समंदर का पानी समंदर में लौटता तो है लेकिन जीर्ण-शीर्ण मानवीय उपनिवेश में छोडे गए जल में रवानगी नहीं होती है , वो जल सड़ जाता है , दुर्गन्ध उससे निकलता है ! समंदर का अस्तित्व का तिरोहण अपनी तटीय -रेखा के परे विनाश-लीला में द्रष्टव्य है !
आत्महंता के इरादों से निकलकर ही समंदर और सूरज का अस्तित्व है ! समंदर अपने तट पर मनुष्यों को आमंत्रित कर अपनी लहरों की रवानगी से मनुष्य के जीवन में गति भरता है , ऊर्जावान बनाता है, सकारात्मक बनाता है !
"अधगल गगरी ,छलकत जाए !" इस कहावत से दूर रहना चाहिए ! हमेशा गगरी में पानी भर लीजिये वरना आधी भरी गगरी घर जाते -जाते बिलकुल खाली हो जायेगी ! ज्ञान के साथ भी ऐसा ही होता है ! ज्ञान परस्पर आदान-प्रदान से बढ़ता है , जितना होगा आप विनम्र होते जाएंगे , झुकते चले जाएंगे ,विनयशील होते चले जाएंगे !



ज्ञान कभी घमण्ड नहीं बांटता है जब ऐसा होता है तो ज्ञान अपनी सीमा से परे जाकर विनाश-लीला करता है , सड़ांध पैदा करता है !
इसीलिए आत्महंता का ख्याल से बचना होगा ! जबतक अपने कर्म से परे दूसरे की निंदा में लगे ,आत्महंता की स्थिति आरम्भ हो जाती है ! सामने मीठी-मीठी बातें और पीठ पीछे निंदा...ये तो विनाश-लीला है !


फ़िल्मी दुनियां के निंदक हिंसक होते हैं ! खून तो नहीं करेंगे लेकिन नुकसान की भरपाई मुश्किल हो जाती है ! फिल्म का हर प्रोफेशनल का चरित्र उद्दात्त होना चाहिए क्योंकि हम फिल्मों में हर किरदार का उद्दात्तीकरण करते हैं ! चाहे वो छोटा हो या बड़ा , उन्हें उनका चरित्र जीना है लेकिन आम जीवन में प्रोफेशनल छिछोरे ज़्यादा ही मिलते हैं ! वो आपका काम अच्छा नहीं करेंगे लेकिन ख़राब ज़रूर कर देंगे ! आपके साथ उठेंगे-बैठेंगे , सीखेंगे , निश्चित रूप से आप भी सीखते हैं लेकिन अलग होते ही पीठ पीछे निंदा शुरू और ऐसे लोग बुरी तरह से क्रोधी, बेज़ार, मनोरोगी और दुनिया को ठेंगे पर रखते हैं !
ये विनाश लीला है !







Friday, January 6, 2017




About Films

Satya Prakash's POV






बंगलुरु -स्त्री-विरोध के बहाने
(औरत और हमारा समाज ) 

  हर चीज़ का मैक्डोनिलिज़शन हुआ है ! बाज़ार हम पर यूँ हावी है कि मत पूछों ! "फिल्म की हीरोइन" की चर्चा ही ज़्यादा होती है ! हीरो तो अक्षय कुमार, अजय देवगन, शाहरुख़ खान, सलमान खान ,अमीर खान और कुछ और नए बाज़ार द्वारा -स्थापित हीरों पुत्रों का ब्रांड है और फिल्म में हीरोइन इनके साथ नयी भी हो .चलेगा ! ये भी पुरुषवादी मानसिकता बाजार पर हावी है ! कुछ भी हो नयी हेरोइनों को बाज़ार एक नए अंदाज़ में ( लेकिन ऑब्जेक्ट से ज़्यादा कुछ नहीं) ही पेश करता है, जैसा कि पुरानी स्थापित हेरोइनों के साथ आरम्भ में हुआ होगा !

हम बाज़ार के प्रेसर से मुक्त नहीं हैं ! महानगरों में सबसे ज़्यादा, छोटे शहरों और सबसे छोटे शहरों में भी ये प्रेसर कम नहीं है ! फिर भी, महानगरों की तुलना में ये कम है !इसीलिए वक़्त की अधिकता की वजह से पूँजी और बाज़ार के अतिरिक्त, जाति और धर्म लोगों की मानसिकता पर हावी होते है ! राजनीतिक और सामाजिक वर्चस्व का सामंती -अवशेष भी औरत को "बिस्तर से ज़्यादा की चीज़ " नहीं समझता है !

वतुतः सदियों से दास-प्रथा हो , राजतन्त्र हो , मुगलों की मनसबदारी हो, अंग्रेजों की व्यवसायिक और तकनीकी -गुलामी ब्रिटानियां राज्य हो या आज़ाद भारत का लोकतंत्र हो , पुरुष और बाज़ार के बीच के रिश्तों में औरत क्रय-विक्रय का सामान बनी रही ! प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप में ही सही !

आधुनिक होने के लिए, सोच को प्रगतिशील और समकालीन होना चाहिए लेकिन बाज़ार बाध्य तो करता है ! बाज़ार का नियामक तत्व मान लीजिये फैशन इंडस्ट्री है तो उसे बेचना भी है और उसे खरीद दार भी चाहिए ! इसीलिए उपभोक्ता-संस्कृति विज्ञापनों के नाना-प्रकार के माध्यमों से फैलाया जाता है और जनता आदतन इसका शिकार हो जाती है ! बहुत कम ऐसी औरत हैं जो इस उपभोक्ता की शिकार न हो रही हो ! शिक्षित और अमीर औरतें दीखती ज़रूर हैं कि वे प्रगतिशील और जागरूक इंसान हैं लेकिन वतुतः वे भी उपभोक्तावादी औरत ही होती हैं जो लंबी कार में घुमती है और बैंक अकाउंट में भरपूर रकम है लेकिन आम जीवन में दूसरें लोगों या औरतों के अधिकारों के विरूद्ध ही बात करती या काम करती नज़र आएगी !

उपभोक्ता-संस्कृति बाजार के भोगवाद -मानसिकता का संवरण और संरक्षण ग्लैमर के परिधानों में करता है ! जनता ग्लैमर के मवाद में धसती चली जाती है !इस उदारवादी पूँजी का वैश्विक- बाज़ार ने हमारे समाज तक तो अपनी पहुच बना ही लिया है लेकिन खतरा तब और बढ़ जाएगा जब पूँजी हमारे घरों को भी दूकान में तब्दील कर देगा!

बाज़ार में पूँजी के बढ़ते प्रभाव ने ही संयुक्त परिवार को छिन्न -भिन्न कर दिया है! ये प्रेसर इतना बढ़ा है कि न्युक्लेअर फॅमिली भी खतरनाक मोड़ पर है ! "live-in-रिलेशन " भी दो-तीन साल में leave-in- Relation में बदल गया है ! बड़े-बुजुर्ग कहते हैं कि बड़े-बड़े-शहरों में लोग बिगड़ गए हैं ,उन्हें अपनी संस्कृति -सभ्यता का अब अता-पता नहीं ! अब तो छोटे-छोटे शहरों में भी तलाक़ होने लगे हैं ! कुछ ही कारण होते हैं जो बाज़ार के प्रेशर से मुक्त होते हैं ! पूँजी की अराजकता बड़ी भयावह होती है और वो सारे रिश्तों को अपने अनंत सागर में समां लेती है !
चाहे ओ अमूर्त आईडिया हो या चाहे मूर्त उत्पाद या चाहे मर्द हो या औरत पूंजीवादी समाज में सबकुछ बिकते हैं ! भारत जैसे विकासशील पूंजीवादी देश में सामंती-मूल्यों के जीवित होने और पूंजीवादी पार्टियों के लिए वोट पाने का खुराक बनने की वजह से नैतिक-मूल्य और सिद्धांतों की बात होती है और आंदोलन उठ खड़े होते हैं !

बंगलुरु की शर्मनाक घटना आवारा पूंजीवाद के बढ़ते पुरुष आवारगी की वजह से संभव हुआ है ! दो लड़को के मोलेस्टेशन से लड़कियां गुस्से में आयी और लड़कियों ने विरोध किया...नया साल क्या हाई-टेक बंगलुरु के नौजवान ऐसे मनाते हैं ? मुझे भी और आपसब को भी गुस्सा आएगा लेकिन ज़्यादा नहीं , लगभद दस साल के बाद , अगर यही ग्लोबल लिबरल इकॉनमी की आवारगी बढती गयी तो लड़कियों का विरोध भी संभव नहीं है , उसकी चर्चा समाचारपत्रों और टेलीविजन न्यूज़ चैनलो पर हो भी जाए तो ये विषय क़ानून का हो जाएगा ! दस-पंद्रह साल बाद, हमारा पूरा समाज और घर पूँजी की गिरफ्त में होंगे ! जैसा कि पश्चमी देशों और अमेरिका में होता है ! हमारे यहाँ ,वैश्यावृति अपराध है लेकिन पूँजीवाद के अबाध विकास इसे क़ानून में तब्दील कर देगा कि वैश्यावृति को काम के दायरे में लाकर इसे टैक्स-भुगतान-प्रक्रिया से जोड़ देगा ! जैसे यूरोपीय देशों के होटल में ठहरे तो एस्कॉर्ट सर्विस में आसानी से उपलब्ध है !नग्न-पूँजीवाद औरत के देह को व्यापार का साधन समझता है और साध्य बेशुमार अर्थ की प्राप्ति !

पूँजीवाद पूँजी के जमाखोरी की प्रतियोगिता में मनुष्य को संवेदनहीन बनाकर उसके जीवन जीने का एक यंत्र बना देता है ! आत्महत्या , अपराध , असमानता , गरीबी, भूखमरी , बेरोज़गारी , हिंसा ,भिखारीपन पूँजीवाद का चरित्र है जिसमे चमकते रोड तो होते हैं लेकिन ज़िन्दगानियां रात में सिसकती है , बड़े-बड़े मॉल तो देखते हैं लेकिन आम आदमी सिर्फ निहार कर आगे बाद जाते हैं ! कैशिनो में सपनो का दाव लगाकर हार जानेवाली मध्यवर्गीय आदमी शराब के नशे में ऊँचे-ऊँचे भवनों से कूद कर आत्महत्या कर लेते हैं !फर्राटेदार इंग्लिश बोलती युवा औरत कैशिनो में शराब बेचती है , देह बेचती है और कैशिनो के सर्कल को घूम कर जब्बर्दास्ती की हँसी हस्ती है ! विशाल आबादी वाले देश के कुछ पूंजीपतियों को अतिरिक्त धन अर्जित कमा कर देने के लिए दिन-रात भागते रहते हैं !

इसीलिए बंगलुरु एपिसोड के कारण ही इस समकालीन व्यवस्था के अंदर सिर्फ औरत ही चीज़ की तरह इस्तेमाल नहीं हो रही है बल्कि पूरी मानवजाति के अंदर की सारी संवेदना को ख़त्म करके यंत्र में तब्दील किया जा रहा है और जब पूँजीवाद के इस नंगे आवारगी में समाज गुलाम-व्यवस्था में लगभग दास-प्रथा में बदल रहा हो तो औरत का ऑब्जेक्टिफिकेशन को कौन रोक सकता है ?

जनता को तय करना है कि इस आवारा पूँजीवाद को आगे बढ़ाना है या एक संविधान-प्रदत्त -जनतांत्रिक समाजवाद चाहिए जहाँ कम से कम इंसानी बुनियादी-सरोकारों के साथ औरत और मर्द को एक इंसान बने रहने की प्रयास-रत-प्रक्रिया से खूबसूरत और समानतामूलक समाज तो बने जिसमे सिर्फ इंसान बसता हो !
 
 
 



About Films

Satyaprakash'S POV


Great salute and Tribute to Om puri saheb 


This is the heart-wrenching news for me to hear our veteran actor’s departure from this world. This actor’s loss means much to me because he remained a versatile actors, good human-being and multi-cultural. Simpleton face and body has fascinated world Cinema. He acted in foreign films.

His recent movie was “The Hundred-Foot Journey “produced by Steven Spielberg. 


New wave Cinema, parallel cinema, art movie, Indie movie had greatly positioned Om Puri Saheb.His acting forte lured directors of main-stream –cinema (Commercial Films) that Om Puri Saheb delivered a magical acting. Bollywood producers and directors used to take Om Puri Saheb in the film for global business because of his American, British and other film’s exposure. 




Indian and world Cinema both had lost their fabulous actor. Om Puri sahib acted in various Indian lingual-cinema of India along with Bollywood. The great artistic voyage from Haryana to Indian Cinema to World Cinema, achieving various accolades worldwide. 

Om Puri sir remained an honest and dedicated human-being with clear opinion on certain issues that influence each citizen.Because of clear stand, he was vehemently attacked and assaulted with filthy words not with language of criticism that had wrenched his heart. He decomposed from composure and vice-versa. An artist keeps traveling from fade-in to fade-out or from fade-out to fade-in. 



Government of India had offered accolade like “Padm shree” in 1990.

Film “ARDHYSATY” will surprise you when you see the intense and agonized Police Inspector who is none other than Om Puri Saheb who is protagonist in the film (1980). Film “AAKROSH” presents Om Puri as a traumatized poor husband and brother of a young sister. As a hero of the film, he maintained his silence under tense trauma except two scenes.



 Who can forget the revolutionary Old security guard Abu Mia of a spice factory where village women are garrisoned by a single guard man in film “MIRCH MASALA” under British rule of India?

His contribution to World Cinema and Indian Cinema has been awesome and mind blowing. Cine-lovers will be remembering , loving and learning from him, his acting character and his real character where remained simpleton human-being.


Tribute to Om Puri